Saturday, August 5, 2017

ग्राहक मरीज "आयुषमान होम्योपैथिक सेंटर" इंदौर व विंग्स आईवीएफ अस्पताल" उदयपुर ,कोटा के विज्ञापनों से सतर्क रहें

ग्राहक अलर्ट
ग्राहक मरीज "आयुषमान होम्योपैथिक सेंटर" इंदौर व विंग्स आईवीएफ अस्पताल" उदयपुर ,कोटा के विज्ञापनों से सतर्क रहें । asci द्वारा उपरोक्त हॉस्पिटलs को ड्रग एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट के उल्लंघन में पाया गया । इनके द्वारा जारी विज्ञापनों को भ्रामक घोषित किया गया ।
#ग्राहक पंचायत ग्वालियर
आयुष्मान होम्योपैथिक सेंटर इंदौर के विरुद्ध शिकायत की गई थी कि इनके द्वारा निम्न विज्ञापन प्रकाशित किया जा रहा है 👇
"1. मधुमेह, रक्तचाप और कैंसर के लिए उपचार संभव है 2. किडनी स्टोन के लिए ऑपरेशन के बिना उपचार 3. गठिया के दर्द को सहन करने की कोई ज़रूरत नहीं है 4. सभी बीमारियों के अंतिम समाधान, - मोटापे से मुक्ति ,महिला रोग, ऊँचाई में वृद्धि, न्यूनतम लागत में बांझपन " ।
विंग्स आईवीएफ अस्पताल के विरुद्ध शिकायत
- उपरोक्त हॉस्पिटल द्वारा नि:संतान दंपत्तियों को संतान प्राप्ति हेतु दावे किए जा रहे है ।
एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल द्वारा उपरोक्त दोनों हॉस्पिटल को ड्रग एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट के नियमों का उल्लंघन करते हुए पाया गया ।
ड्रग एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट के अनुसार उपरोक्त बीमारियों के उपचार या निवारण हेतु विज्ञापनों के माध्यम से किसी भी प्रकार के दावे नहीं किए जा सकते हैं । उपरोक्त समस्त बीमारियों के उपचार हेतु अखबार या टेलीविजन के माध्यम से विज्ञापनों को ड्रग एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट के अंतर्गत प्रतिबंधित किया गया है ।
इस प्रकार के दावे करते हुए पाए जाने पर संबंधित अखबार व विज्ञापन दाता पर 1 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है ।
ग्राहक पंचायत ग्वालियर समस्त ग्राहक बंधुओं से आग्रह करता है कि अखबारों व टेलीविजन के माध्यम से प्रकाशित होने वाले इस प्रकार के प्रतिबंधित विज्ञापनों के बहकावे में आकर कोई भी निर्णय ना लेवे । विज्ञापन के माध्यम से इस प्रकार की बीमारी के ठीक होने का दावा नहीं किया जा सकता है ।
संपूर्ण भारत में कहीं भी अखबारों में इस प्रकार के विज्ञापन देखे जाने पर शिकायत एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया ascionline.org या ग्राहक पंचायत को भी शिकायत कर सकते हैं ।
सतर्क रहे - आर्थिक नुकसान से बचे


गलत ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर पर 12 लाख जुर्माना

गलत ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर पर 12 लाख जुर्माना

बिलासपुर - 
जिला उपभोक्ता फोरम ने गायनेकोलॉजिस्ट नहीं होने के बावजूद महिला की बच्चादानी की गलत तरीके से सर्जरी करने के मामले में डॉक्टर को 5 लाख रुपए उपचार व्यय व 7 लाख जुर्माना समेत 12 लाख रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है। ऑपरेशन के बाद महिला का स्वास्थ्य निरंतर खराब होने लगा था। हैदराबाद में उपचार के बाद महिला स्वस्थ हुई।
विनोवा नगर निवासी आवेदिका श्रीमती संगीता चंदेरिया पति भूपेन्द्र चंदेरिया (42) पेट दर्द व आंतरिक समस्याहोने पर सरजू बगीचा स्थित साईं हॉस्पिटल के डॉ. संजय ढांढरिया से 6 अप्रैल 2013 को संपर्क किया। डॉक्टर ने पीड़िता को उपचार के लिए 8 अप्रैल 2013 को बुलाया।
जांच के बाद उन्हाें ने ऑपरेशन करने की सलाह दी। साथ ही 40 हजार रुपए खर्च आने की जानकारी दी। पीड़िता ने जान बचाने के लिए 40 हजार रुपए व्यवस्था कर अस्पताल में जमा किया। डॉक्टर ने बिना जांच व परीक्षण पीड़िता की सर्जरी कर बच्चादानी को बाहर निकाल दिया।
इसके बाद दूसरे दिन 9 अप्रैल को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया। 10 अप्रैल को पीड़िता को असहनीय दर्द होने लगा। इस पर उन्होंने डॉक्टर को जानकारी दी। उन्होंने दवा देकर धीरे-धीरे ठीक होने की बात कही। इसके बावजूद पीड़िता की समस्या समाप्त नहीं हुई। बार-बार डॉक्टर से संपर्क कर उपचार कराया गया।
डॉक्टर ने एक माह बाद 6 मई 2013 को डांटते अपोलो जाने के लिए कह दिया। इसके बाद पीड़िता अपोलो में जांच कराई। मामला क्रिटिकल होने पर उसे एआईएनयू हैदराबाद भेजा गया। यहां लंबा उपचार के बाद पीड़िता की स्थिति में सुधार हुआ। पीड़िता ने 12 मार्च 2015 को जिला उपभोक्ता फोरम में आवेदन प्रस्तुत कर डॉक्टर द्वारा गलत सर्जरी करने पर उपचार में आए खर्च तथा क्षतिपूर्ति दिलाए जाने की मांग की।
मामले में चिकित्सक की ओर से जवाब पेश कर कहा गया कि महिला की नियमानुसार सर्जरी की गई थी। यह ऑपरेशन के बाद आने वाली सामान्य शिकायत थी। उसका उपचार किया जा रहा था। जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष अशोक कुमार पाठक व सदस्य प्रमोद वर्मा, रीता बरसैंया ने सुनवाई में पाया कि डॉ. संजय ढांढरिया गायनेकोलॉजिस्ट नहीं होते हुए भी गायनिक समस्या होने पर सर्जरी कर दी।
इसके कारण उसकी समस्या बढ़ी है। सेवा में कमी पाए जाने पर फोरम ने डॉक्टर को एक माह के अंदर उपचार में आए खर्च 5 लाख रुपए 12 मार्च 2015 से अदायगी तक 9 प्रतिशत ब्याज समेत भुगतान करने, 7 लाख रुपए मानसिक क्षतिपूर्ति व 5 हजार रुपए वाद व्यय देने का आदेश दिया है।

हेयर आइल पर कंज्यूमर फोरम ने दिया अमिताभ बच्चन को नोटिस

हेयर आइल पर कंज्यूमर फोरम ने दिया अमिताभ बच्चन को नोटिस
#ग्राहक पंचायत ग्वालियर
कंज्यूमर फोरम ने भ्रामक विज्ञापन के मामले में सदी के महानायक सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को नोटिस जारी किया है। इसी के साथ मेसर्स इमामी लिमिटेड कोलकाता से भी जवाब-तलब कर लिया गया है।जबलपुर निवासी पीडी बाखले ने डेमोक्रेटिक लायर्स फोरम के साथ मिलकर कंज्यूमर फोरम की शरण ली है।
उनकी ओर से जारी परिवाद में आरोप लगाया गया है कि अभिनेता अमिताभ बच्चन ने नवरत्न तेल बनाने वाली कंपनी को अपनी व्यापक लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए अवसर देने की गलती की है। उनके इस आचरण से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-1986 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है। साथ ही कंपनी का भ्रामक विज्ञापन सेवा में कमी के दायरे में भी आता है।
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता ओपी यादव व रविन्द्र गुप्ता ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि नवरत्न तेल में विज्ञापन में अमिताभ बच्चन ठंडा-ठंडा, कूल-कूल कहते नजर आते हैं। वे यह भी दावा करते हैं कि सरदर्द, बदन दर्द, थकान और बालों की समस्या से यह तेल राहत दिलाता है। लेकिन वे यह साफ नहीं करते कि यह तेल वाकई ठंडा-ठंडा, कूल-कूल है या नहीं? यदि यह जड़ी-बूटियों से मिलकर बना है, तो उनकी मात्रा क्या है? जड़ी-बूटी मिली होने की सूरत में यह तेल नहीं औषधि की श्रेणी में आ जाएगा। जिसके लिए लाईसेंस अनिवार्य है।
चूंकि नवरत्न तेल के निर्माणकर्ता के पास कोई लाईसेंस नहीं है, अत: अवैध उत्पाद का विज्ञापन उचित नहीं माना जा सकता। अपने स्टारडम का अनुचित उपयोग कर पैसे कमाने का रवैया अमिताभ बच्चन जैसे कद्दावर अभिनेता को शोभा नहीं देता। लिहाजा, इस मामले में कंपनी से 15 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति राशि दिलवाई जाए। साथ ही उत्पाद पर रोक लगा दिया जाए।

CHANDIGARH: BJP's Haryana unit chief Subhash Barala's son was arrested late Friday night after he and a friend allegedly chased and harassed the daughter

CHANDIGARH: BJP's Haryana unit chief Subhash Barala's son was arrested late Friday night after he and a friend allegedly chased and harassed the daughter of a senior Haryana bureaucrat on a prominent thoroughfare of Chandigarh.

The girl was driving a car while Vikas Barala and Ashish Kumar were in an SUV. The men allegedly tried to waylay the girl's car repeatedly and even tried to enter the vehicle.

The girl's father posted the entire details on Facebook. "As a father of two daughters, I feel compelled to take this matter to its logical conclusion. The goons must be punished, and the law must take its course. As would be expected, the goons are from influential families," he said. Police intercepted the two on Friday night while they were still following the girl. The cops have charged them with stalking and wrongful restraint. Officials said their medical report confirmed they were in an inebriated state at the time of arrest.

DSP Satish Kumar said the girl called up police control room around 12.35 am and reported that two boys in a white Tata Safari had been following her. She alleged that the accused tried to block her car thrice at different locations.

While Vikas was in the driver's seat, his friend was sitting next to him when they were intercepted.

Kumar told TOI that that the two men were consuming liquor in the car and driving around the city. "According to our investigation, when they noticed a lone girl in a car, they started following her," he said.


In her complaint, the girl said at one point, Ashish even stepped out of the SUV and tried to open one of the doors of her car.


She had, however, locked all doors and managed to speed away. The girl's statement was recorded under Section 164 of the Criminal Procedure Code (CrPC).

Ivan Bigger



Congress attacked the BJP government, saying the incident had hurt the 'Beti Padaho, Beti Bachao' campaign.


However, Haryana chief minister Manohar Lal Khattar said, "This incident is not about Subhash Barala, but of an individual. Chandigarh police is quite capable and will do a fair investigation. We have full faith in the law of the land."

Friday, December 5, 2014

डाक विभाग से परेशान हैं, कंस्यूमर कोर्ट है ना

डाक विभाग से परेशान हैं, कंस्यूमर कोर्ट है ना
देश की एक बड़ी आबादी अभी भी ऐसी है, जो डाक विभाग पर पूरी तरह निर्भर है। लेकिन इस विभाग से उनकी शिकायतें भी कम नहीं हैं। परेशान लोगों में वह गरीब भी आता है, जिसने सौ रुपया महीना जोड़कर पोस्ट ऑफिस में जमा कराया, तो वह रिटायर्ड कर्मचारी भी, जिसने अपनी सारी जमा पूंजी नैशनल सेविंग्स स्कीम या मंथली इनकम स्कीम में बेहतर रिटर्न की आशा से निवेश कर दी। परेशान वे छात्र भी होते हैं, जिन्होंने जॉब के लिए आवेदन डाक से भेजा, लेकिन वह अपने पते पर समय बीतने के बाद पहुंचा। ऐसा भी हुआ है कि बेटे के भेजे पैसे बूढ़े बाप को छह महीने तक नहीं मिले, तो बाप ने बेटे को फीस के लिए जो पैसे भेजे, वह कभी नहीं मिले और उसका कॉलेज से नाम ही कट गया। 
जाहिर है, कंस्यूमर कोर्ट में डाक विभाग के खिलाफ शिकायतें खूब आती हैं। शुरुआत में पोस्ट ऑफिस एक्ट 1898 में दिए गए प्रावधानों के तहत कर्मचारियों और अधिकारियों को मिलने वाली छूट का हवाला दिया जाता था कि डाक के खो जाने, गलत जगह दे दिए जाने, देर होने या नष्ट हो जाने के लिए वे जवादेह नहीं होंगे, लेकिन बाद में इसे थोड़ा कसा गया। यदि कोई धोखा करके, जानबूझ कर या असावधानी से आम लोगों का नुकसान करता है तो इस बात के साबित होने पर कर्मचारी और डाक विभाग के खिलाफ सेवा में कमी का मामला बन सकता है। हालांकि इस बात को साबित कर पाना लंबे अर्से तक कठिन रहा, लेकिन जैसे-जैसे कंस्यूमर कोर्ट सक्रिय होती गई, कई तरीकों से बातें पकड़ में आने लगीं। 
साल 2000 में पोस्ट मास्टर, इम्फ़ाल बनाम डॉक्टर जामनी देवी के मामले में एक बड़ा फैसला आया, जिसमें नैशनल कमिशन ने डाक विभाग के खिलाफ सेवा में कमी को परिभाषित करते हुए माना कि एक पैकेट या पत्र डाक विभाग को मात्र कुछ पैसे की टिकट लगाकर सौंप देने से आप कश्मीर से कन्याकुमारी तक के इतने बड़े नेटवर्क की सुविधा लेने के लिए पूरी कीमत नहीं चुका देते। यह एक सरकारी सुविधा है, जिसमें सरकार का पूरा तंत्र काम करता है इसलिए यह साबित किए बिना कि किसी कर्मचारी ने जानबूझ कर या असावधानी से ऐसा किया है, डाक विभाग को सेवा न देने का दोषी नहीं माना जा सकता। हालांकि मनीऑर्डर, स्पीड पोस्ट या रजिस्टर्ड सर्विसों के लिए डाक विभाग द्वारा ज्यादा रकम लेने के कारण विभाग की जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि ज्यादा पैसा आश्वस्त होने के लिए ही खर्च किया जाता है। 
अब इंटरनेट व्यवस्था से डाक की स्थिति की जानकारी उपलब्ध होने लगी है, जिससे यह पता चल जाता है कि रुकावट कहां पर थी। ऐसे में डाक विभाग अब अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। 2012 में नैशनल कमिशन ने दो महत्वपूर्ण फैसले दिए, जिनमें डाक विभाग को सेवा में कमी के लिए दोषी माना गया। एक मामले में शिकायकर्ता ने 4000 रुपये का मनीऑर्डर भेजा, जिसमें से 1000 रुपये ही मिले। मामला अदालत पहुंचा और कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इनकार कर दिया कि सैटलाइट ट्रांसमिशन में दोष था, इसलिए ऐसा हुआ। अदालत ने कंस्यूमर को 12 फीसदी ब्याज के साथ पूरी रकम देने का आदेश दिया। दूसरे मामले में अपनी ही गलती से विभाग ने जॉइंट अकाउंट को ट्रांसफर कर दिया और गलती ठीक भी कर ली, लेकिन ब्याज देने से इनकार कर दिया। कंस्यूमर कोर्ट ने डाक विभाग को इस मामले में भी दोषी माना। 
दिलचस्प यह है कि कुछ मामले ऐसे भी सामने आए , जिसमें ऐसी योजनाओं में पैसा इनवेस्ट कर लिया गया , जिसमें वह हो ही नहीं सकता था। मैच्योरिटी पर डाक विभाग ने उसे अनियमित निवेश कहकर ब्याज देने से मना कर दिया। 2011 के एक फैसले में नैशनल कमिशन ने कहा कि नियम बताना डाक विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी है और नियमों के खिलाफ इनवेस्टमेंट लेने में उनका भी बराबर का दोष बनाता है। 
ऐसे में अगर आपको भी डाक विभाग से जुड़ी कोई समस्या है तो आप कंस्यूमर कोर्ट जा सकते हैं और वहां आपको न्याय मिल सकत ा है।

Thursday, December 4, 2014

माल कम मूल्य अधिक : यह कैसा बाज़ार ?

माल कम मूल्य अधिक : यह कैसा बाज़ार ?
कुछ समय पहले की बात है जब हम दूध की डेयरी पर दूध लेने जाते थे तो यदि हम एक लीटर दूध डेयरी वाले से मांगते थे तो वह एक लीटर दूध नापने के बाद सौ या पचास ग्राम दूध अलग से डाल दिया करता था। किसी सब्ज़ी कीे दुकान पर सब्ज़ी बेचने वाला खरीदी गई सब्ज़ी के साथ हरी मिर्च व धनिया मुफ्त में ही दे दिया करता था। इस प्रकार की ‘उदारवादिता’ अब भी कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है। पहले ग्राहक किसी वस्तु को खरीदने से पहले उसकी गुणवत्ता,उसकी ताज़गी,टिकाऊपन आदि बातों को गौर से देखने व परखने के बाद उसे खरीदा करता था। वह भी खूब मोल-भाव करने के बाद। ज़ाहिर है यह हमारे भारतीय बाज़ार तथा यहां के मेहनतकश बहुसंख्य समाज का एक स्वभाव था। परंतु अब तो लगता है समय ही बदल गया है। मुफ्त में दूध,हरी धनिया व हरी मिर्च मिलना तो दूर दुकानदारों के दुकानदारी करने का तरीका ही बदल गया है। 30 रुपये किलोग्राम मिलने वाली किसी वस्तु को यदि आप दुकानदार से आधा किलो यानी 15 रुपये की कीमत की सामग्री देने को कहें तो वह स्वयं ही कहने लगता है कि 20 रुपये की पूरी कर दूं। और यदि आपने मना किया कि नहीं हमें तो 15 रुपये का आधा किलो सामान ही चाहिए तो दुकानदार पंाच रुपये फुटकर मांगने या अपने पास फुटकर पांच रुपये न होने का बहाना करने लग जाता है। इसी प्रकार दूध के जिस कारोबार में कल तक डेयरी मालिक दूध में पानी मिलाने को केवल अपराध ही नहीं बल्कि पाप की श्रेणी में गिना करते थे आज वही दुग्ध विक्रेता पानी में ‘दूध’ मिलाते दिखाई दे रहे हैं। देश में मिलावटी व रासायनिक दूध की बिक्री का जो कारोबार अपने चरम पर है वह तो विषय ही अलग है?
आजकल सीलबंद अथवा पाऊच में विभिन्न प्रकार की सामग्रियों की बिक्री हो रही है। ऐसे सामानों के ग्राहक भी बहुत अधिक हैं। ऐसी सामग्रियों में खाद्य सामग्री से लेकर कपड़ा,रेडीमेड गारमेंटस,बेकरी से संबंधित सामान,महिलाओं की साज-सज्जा से जुड़ी सामग्री तथा कंप्यूटर संबंधी कई सामान आदि शामिल हैं। इन वस्तुओं को आपको खोलने की उस वक्त तक इजाज़त नहीं है जब तक आप इनके पैसे चुकता न कर दें। यानी पैसे दीजिए फिर सामान लीजिए। इसे अपने घर ले जाईए और वहां आराम से खोल कर देखिए कि सामान आपकी पसंद,इच्छा तथा सोच के अनुरूप है अथवा नहीं। यदि सामान वैसा ही निकलता है तो आप अपनी लॉटरी निकली समझ सकते हैं। अन्यथा कोई आश्चर्य नहीं कि आपको पैकेट खोलने अथवा सील तोडऩे के बाद अपना सिर पीटना पड़े। कई अत्यधिक ‘समझदार‘ व्यवसायियों ने अब अपने उत्पाद पारदर्शी पैकेट में रखना ही बंद कर दिया है ताकि वह आपको नज़र ही न आए। इसके बजाए वे उसी पाऊच पर एक अत्यधिक सुंदर,आकर्षक व मन को लुभाने वाला चित्र छाप देते हैं जो ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। जबकि पाऊच के भीतर रखी गई सामग्री की शक्ल व सूरत उस पर प्रकाशित चित्र से भिन्न होती है। यही हाल रेडीमेड गारमेंटस के क्षेत्र में भी है। पैंट-शर्ट आपको पैक की हुई दिखाई जाती है। यानी आप उसके कपड़े को भी छू कर नहीं देख सकते। केवल उसका प्रिंट,रंग व सामने की ओर दिखाई देती डिज़ाईन के आधार पर उसे खरीदना होता है। पैसे देने के बाद ही उसे खोलकर देख सकते हैं। अब यदि पैकिंग खोलने के बाद आपको उस का कपड़ा पसंद न आया तो यह आपकी िकस्मत है। यही स्थिति कंप्यूटर के कई सामानों में है। उदाहरण के तौर पर प्रिंटर में इस्तेमाल होने वाली कार्टेज जो लगभग पांच सौ रुपये की एक अदद मिलती है वह बावजूद इसके कि उच्चकोटि की पैकिंग में सील की जाती है। परंतु यदि खरीदने के बाद खोलने पर वह कार्टेज ठीक ढंग से प्रिंट नहीं निकाल पाती तो आप केवल अपना माथा पीट सकते हें। कंपनी से इस विषय पर कोई शिकवा-शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि दुकानदार इसकी कोई्र गारंटी या वारंटी नहीं लेता।
मिठाई की दुकानों पर मिठाई के साथ डिब्बे तौल कर देना हालांकि गैरकानूनी है। परंतु लगभग पूरे देश में मिष्ठान विक्रेताओं द्वारा धड़ल्ले से यह अंधेरगर्दी की जा रही है। तीन सौ रुपये किलो से लेकर हज़ार रुपये किलो तक बिकने वाली मध्यम श्रेणी की मिठाईयों के साथ डेढ़ सौ या दौ सौ ग्राम तक के वज़न के गत्ते के डिब्बे तौले जा रहे हैं। अब तो इन मिष्ठान विक्रेताओं ने ग्राहकों को लूटने के लिए गत्ते का डिब्बा बनाने वालों के साथ मिलकर डिब्बों में एक नया शोशा जोड़ दिया है। अब मिठाई के डिब्बों में गत्ते की ही खपत करके उसमें अलग-अलग लाईनें बनाई जाती हैं और उन लाईनों अथवा चैनल के बीच की जगह में ही मिठाईयां फंसाई जाती हैं। कहने को तो यह डिब्बा एक किलोग्राम मिठाई का डिब्बा होता है। परंतु यदि आप इसमें रखी मिठाई को डिब्बे से बाहर निकाल कर अलग से तौलें तो इसमें अधिक से अधिक 500 ग्राम से लेकर 600 ग्राम तक ही मिठाई निकलेगी। यहां यह भी काबिल-ए-गौर है कि ऐसे डिब्बों का इस्तेमाल आमतौर पर उच्च कोटि के मिष्ठान विक्रेताओं द्वारा किया जा रहा है जहां मिठाईयां भी साधारण मिष्ठान विक्रेताओं से अधिक मंहगी होती हैं। परंतु धनाढ्य लोग,दो नंबर की कमाई करने वाले ग्राहक अथवा रईस तबके के ग्राहक या नव धनाढय फुकरा वर्ग जो न सिर्फ ठगी करने वाले ऐसे दुकानदारों से खुश होकर सामान खरीदता है बल्कि उनकी लूटमार की ऐसी हरकतों पर उंगली भी नहीं उठाता। और ग्राहकों की यही खामोशी ठगी करने वाले दुकानदारों को शह देती है।
रोज़मर्रा में घरेलू इस्तेमाल की तमाम वस्तुएं जैसे टुथपेस्ट,साबुन,वाशिंग पाऊडर,तेल,लोशन,क्रीम,पाऊडर जैसी वस्तुओं की पैकिंग तथा इनकी कीमतों में आए दिन नया परिवर्तन हो रहा है। इनमें से अधिकांश सामानों के वज़न तो घटते जा रहे हैं जबकि इनके मूल्य निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे सामानों की पैकिंग भी बाज़ार में ऐसी पेश की जा रही है कि ग्राहकों को देखने में तो पैक्ड सामान भारी-भरकम,बड़ा या अधिक दिखाई दे परंतु खोलने पर यही वस्तु ग्राहक की उम्मीदों से कम व छोटी होती जा रही है। इस संदर्भ में उन वस्तुओं की बिक्री का जि़क्र करना ज़रूरी है जो पाऊच में माल कम हवा अधिक भरकर बेची जा रही हैं। ऐसी सामग्रियों में चिप्स,नमकीन तथा कुरकुरे जैसी कई वस्तुएं शामिल हैं। इनके पैकेट तो देखने में काफी ‘सेहतमंद’ दिखाई देते हैं जबकि इनके भीतर केवल इतनी सामग्री पड़ी होती है गोया कि वह सैंपल मात्र के लिए ही पाऊच में डाली गई हो। इस प्रकार के पाऊच भी पारदर्शी नहीं होते बल्कि गहरे रंगों में प्रिंट कराए गए होते हैं ताकि ग्राहक उन पाऊच को सूरज की रोशनी के सामने करने के बाद भी यह न देख सके कि उसमें कितना सामान पैक किया गया है। माल कम मूल्य अधिक की नीति पर हमारे देश का फैशन बाज़ार भी पूरी गति के साथ चल पड़ा है। उदाहरण के तौर पर फुल पैंट व हाफ पैंट के बीच का एक आईटम जिसे कैपरी के नाम से जाना जाता है इसने पिछले कई वर्षों से भारतीय बाज़ार में अपनी खूब धाक जमाई हुई है। इस पहनावे की कीमत फुल पैंट से कम नहीं है। जबकि इसमें फुल पेंट से कहीं कम कपड़ा लगता है। इसी प्रकार बेहद चुस्त पैंट व कमर से नीचे बांधे जाने वाली पैंट का फैशन इस समय अपने शबाब पर है। इसी प्रकार कमर से ऊपर तक की शर्टस बाज़ार में फैशन के नाम पर बिक रही हैं। इनमें जहां कपड़ों की बचत होती है वहीं इनकी सिलाई में भी समय व सामग्री का कम इस्तेमाल होता है। परंतु फैशन के नाम पर इनके मूल्य अधिक होते हैं। अब तो फटे हुए कपड़े भी फैशन के नाम पर बाज़ारों में मंहगी कीमत में बिकने लगे हैं। कपड़ों पर यदि सिलाई गलत तथा उल्टी-सीधी हो जाए तो उसे भी दुकानदार अथवा कंपनियों द्वारा माडर्न फैशन बताकर बेच दिया जाता है। उत्पाद में कम सामग्री लगाने में बड़ी-बड़ी रेडीमेड गारमेंटस बनाने वाली कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। मिसाल के तौर पर जुराब जैसी छोटी वस्तु को ही ले लीजिए। पहले यह जुराब घुटने से कुछ ही नीचे तक की लंबाई की मिला करती थी। अब इसका आकार इतना घट गया है कि यह पहनने के बाद ऐसे लगती है जैसे कि जूते के भीतर जुराब पहनी ही न गई हो। इस प्रकार की सैकड़ों वस्तुएं बाज़ार में ऐसी बिक रही हैं जो मंहगाई के इस ज़माने में भी ग्राहकों की लूट का कारण बन रही हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में तथा बाज़ारवाद के युग में कम माल खरीदकर अधिक मूल्य चुकता करना क्या यही असली व सच्चे बाज़ार की परिभाषा है?

इंटरनेट शॉपिंग में सावधानी जरूरी

इंटरनेट शॉपिंग में सावधानी जरूरी
ई-कॉमर्स इन दिनों बूम पर है। नेट से खरीदारी ने इतना ज़ोर पकड़ लिया है कि लोग अब बाजार जाकर शॉपिंग करने से बचने लगे हैं। हालांकि ई-कॉमर्स के लिए अलग से किसी खास कानून के अभाव में भी सब काम चल रहा है, जबकि कंज्यूमर की शिकायतें बहुत ज्यादा हैं। प्रॉडक्ट में कमी, ऑर्डर से हटकर डिलिवरी, पैसा लेकर डिलिवरी न देना और रिफंड ना करने की शिकायतें सबसे ज्यादा हैं।
हमारे पास कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट तो है, लेकिन कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां तब आती हैं, जब लोग वेबसाइट की पूरी जानकारी लिए बिना इंटरनेट के माध्यम से डील कर लेते हैं, पैसे भी क्रेडिट कार्ड से दे देते हैं और फिर वेबसाइट चलाने वाले अचानक गायब हो जाते हैं। ऐसे में कंज्यूमर कोर्ट चाहकर भी ठगे गए लोगों की मदद नहीं कर पाती, क्योंकि कोर्ट का नोटिस देने के लिए दोषी पक्ष का पूरा पता चाहिए।
कोनसीम इन्फो प्राइवेट लिमिटेड बनाम गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के मामले में दिल्ली की अदालत में गूगल ने यह तर्क दिया कि गूगल एक सर्च इंजन है और इस पर कोई भी वेबसाइट क्या विज्ञापन देती है, इसकी जिम्मेदारी गूगल की नहीं होती। अदालत ने इस तर्क को माना, लेकिन यह भी कहा कि यदि किसी फ्रॉड की सूचना गूगल को मिलती है तो 36 घंटों के अंदर उसे भी ऐक्शन लेना होगा।
ई-कॉमर्स वेबसाइट से शॉपिंग के मामले में दूसरी बड़ी कठिनाई यह आती है कि मामला किस कोर्ट में चलाया जाए और ऐक्शन कहां हुआ माना जाए? फिलहाल इंटरनेट के माध्यम से होने वाली शॉपिंग के लिए कंज्यूमर कोर्ट कंपनी के एड्रेस और कंज्यूमर का निवास, दोनों ही जगहों पर मामले दर्ज कर रही है। इसलिए अब यह समस्या नहीं रही। इसी तरह नेट पर भ्रामक विज्ञापनों को हैंडल करने के मामले में भी कंज्यूमर कोर्ट सक्षम है, लेकिन इसके लिए फ्रॉड कंपनियों का सही पता होना जरूरी है। खास बात यह कि किसी चैनल पर दिए जाने वाले भ्रामक प्रोग्राम के लिए चैनल को भी पार्टी बनाया जा सकता है।
वैसे, कुछ सावधानियां कंज्यूमर को भी ध्यान में रखनी चाहिए:
- डील करने से पहले कंपनी के कारोबार का पता, उसका रजिस्टर्ड ऑफिस और ब्रांच आदि की जानकारी लें। अनजानी वेबसाइट्स पर भरोसा न करें।
- सामान बेचने की प्रक्रिया, ट्रैकिंग संबधी सूचना, प्राइवेसी पॉलिसी आदि की जानकारी विस्तार से लिए बिना अपना अकाउंट नंबर वेबसाइट पर न दें। और अगर आपने कहीं गलती से वह दे दिया है तो अपने अकाउंट को चेक करते रहें।
- यदि ऑर्डर प्लेस होने के बाद प्रॉडक्ट उपलब्ध नहीं होने की सूचना मिलती है तो आप साइट को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि ये प्लैटफॉर्म आपको डीलरों की मदद से सामान उपलब्ध कराते हैं और यह डिमांड व सप्लाई पर निर्भर करता है।
- ऑर्डर कन्फर्म होने के बाद आपको इसकी सूचना दी जाती है और ऑर्डर नंबर दिया जाता है। इसे संभालकर रखें।
- वैसे, अगर आप इस शॉपिंग के लिए कैश ऑन डिलिवरी ऑप्शन को चुनें तो रिफंड की लंबी प्रक्रिया से बच सकते हैं।
- अगर आप बार-बार कैश ऑन डिलिवरी ऑर्डर करके डिलिवरी नहीं लेते तो कंपनी के रेकॉर्ड में आप डिफॉल्टर हो सकते है। ऐसे में अगर वह कंपनी आपका ऑर्डर न ले या ऑर्डर कन्फर्म न करे तो आप उसे कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि अपना प्रॉडक्ट न बेचने का अधिकार उसके पास है।